मनोरंजन

ग़ज़ल – विनोद निराश

खोई-खोई आँखे सुर्ख रुखसार है,

देख रूखे-जानां दिल बेकरार है।

 

रुख पे लट आँखों में मदहोशी,

रब जाने किसकी तलबगार है।

 

सुर्ख लब हल्का सा तबस्सुम,

मिज़ाज़े-दिल आज बे-ऐतबार है।

 

मदभरी शरबती झिल सी आँखे,

नज़रे झुका रही बार-बार है।

 

झूकी नज़र अबरू की कमाने,

ह्या-औ-अदब सलीका बेशुमार।

 

सर से पाँव तक लगे कयामत,

देख हुस्ने-यार दिल जार-जार है।

 

सोचा तो सोचते रह गए निराश,

किसके नसीब में ये गमख्वार है।

– विनोद निराश , देहरादून

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