किसी को सियासत बचानी है
किसी को अपनी पद प्रति
ष्ठा बचानी है
किसी को अपनी नौकरी, रोज़ी रोटी बचानी है
किसी को बिकी हुई कलम और
गिरवी रखी आवाज की शाख बचानी है,
किसी ने हुक़्मरान को इस क़दर
महिमा मंडित कर लिया कि अब वो
सच कहने के लायक़ ही नहीं बचे,
उनको अपनी जी-हज़ूरी बचानी है
सबका होना बचा है इस देश में
सिवाय इंसान होने के ……………?!
– ज्योत्सना जोशी #ज्योत, देहरादून , उत्तराखंड