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हिंदी ग़ज़ल – जसवीर सिंह हलधर

आकाश झिलमिला गई ये रेत की नदी ।

माहौल खिलखिला गई ये रेत की नदी ।

 

फौलाद को गला दिया ठंडे कढ़ाव में,

कर एक सिलसिला गई ये रेत की नदी ।

 

तूफान दूर से मुझे यूं घूरता रहा ,

पाताल को हिला गई ये रेत की नदी ।

 

खिलने लगे गुलाब शुष्क रेगजार में ,

मेघों को तिलमिला गई ये रेत की नदी ।

 

अदबी मुकाम दे गई औगड़ गंवार को ,

सम्मान वो दिला गई ये रेत की नदी ।

 

बस एक गांव की तलाश थी फ़कीर को ,

देकर उसे जिला गई ये रेत की नदी ,

 

जिसने कहा कि क्या मुझे शऊर नज़्म का ,

उसको कढ़ी पिला गई ये रेत की नदी ।

 

“हलधर” उसी अदीब को निकले थे खोजने ,

दुष्यंत से मिला गई ये रेत की नदी ।

– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून

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