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श्रमिक – रेखा मित्तल

भोर हुई , ले डिब्बा,

चल दिया,घर बनाने,

दिन रात  श्रम  करता,

मेहनत से न घबराता,

दो वक़्त की रोटी के लिए,

स्वाभिमान को नहीं बेचता,

मन के भीतर द्वन्द् चल रहा,

प्रश्न एक है बहुत बड़ा??

बनाता जो सब के लिए घर,

सोता वही मजदूर फुटपाथ पर,

उगाता है जो सबके लिए फसल,

मिलता नहीं है उसको पेट भर,

साधन है नहीं कोई उसके पास,

मिटानी है सबकी भूख प्यास,

कोशिश है बस इतनी उसकी,

मजबूर न हो बच्चे मेरी तरह,

बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा लूं,

जिंदगी को उनकी संवार लूं।

तपती धूप, लम्बी दोपहर,

हुआ पसीने से तर-बतर,

हथौड़ा चल रहा है अनवरत,

अपनी धुन में है मस्त,

काम तो अपना करना है,

जीवन पथ पर चलना है।

चर्चा हो रही मजदूर दिवस की

पर नहीं खबर  शायद उसको

मन की व्यथा किस से कहें?

दिल का दुखड़ा किसे सुनाएं?

—✍️रेखा मित्तल, चण्डीगढ़

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