दुख,दर्द,पीड़ा,व्यथा और वेदना
कितनी तीव्र है इनमें भावों की संवेदना।
कर सके इसका अनुभव केवल वो
जीवन में इन आवेगों का भुक्तभोगी है जो।
दुख की गहनतम सीमा क्या होगी,
कितनी,किसको,कब,कैसे और कहाँ होगी।
है यह कठिन शब्दों में परिभाषित होना,
हृदय के उदगार हैं केवल आँसूओं से रोना।
असीम वेदना का नहीं कोई परिमाप,
पूर्व जन्म के कर्म या कहे कोई इसे पाप ।
अदला-बदली नहीं कोई,ना ही तप-त्याग,
सहना होता है सभी को अपना भाग।
अभिशाप ये धरती पर मानव जीवन का,
एक का दुख ही सुख है दूसरे के मन का।
संवेदना दिखा मनुष्य ये जता जाता है,
ना चाहकर भी स्व भाग्य पर इतरा जाता है।
शुक्र है!जीवन में उसे वो दुख नहीं मिला,
जिसे पाकर सामने वाले को है शिकवा-गिला।
वस्तुतःपर पीड़ा की अनुभूति नहीं होती,
किसी की पीड़ा दूसरे की आँखो से नहीं बहती
असीम,अनंत वेदना की जो होती गहराई,
बस अनुभूत करे वो जिसने वैसी ठोकर खाई।
व्यर्थ है किसी के समक्ष दुखों का प्रलाप,
सीखें सदा सहना प्रकृति से इसे चुपचाप ।
– प्रीति यादव, इंदौर, मध्यप्रदेश