कथ्य की मरने लगी अब अर्थगत संभावनाऐं ।
सत्य की अभिव्यक्तियां कैसे कहें किसको सुनाऐं ।
आ रहें हैं सात दसकों से शिलायें पीसते हम ,
लोग पत्थर के हुए हैं मर गयी संवेदनाऐं ।
रोज विष का पान करती रो रही गंगा हमारी ,
युक्तियां पायी नहीं जो रोक दें दूषित प्रथाऐं।
काव्य भाषा छंद वाला रुक गया साहित्य का रथ ,
मंच से कुछ नामधारी व्यर्थ करते व्यंजनाऐं।
कौन समझेगा हमारी कौम की अंतर्व्यथा को ,
यंत्र युग में मंत्र अपनी खो चुके नैतिक ऋचाऐं ।
दर्द दुनिया में हमारा कौन जानेगा बताओ ,
पाठकों को खोजती हैं अब किताबों में कथाऐं।
सात तारे आशमा के क्षुब्ध दिखता चंद्रमा भी ,
सभ्यता से लुप्त होती दिख रही वैदिक विधाऐं।
मौन वृत धारण किया है मध्यमा औ वैखुरी ने ,
नाद पश्यंती ,परा का मौन “हलधर” गर्जनाऐं।
– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून