मनोरंजन

ग़ज़ल हिंदी – जसवीर सिंह हलधर

कथ्य की मरने लगी अब अर्थगत संभावनाऐं ।

सत्य की अभिव्यक्तियां कैसे कहें किसको सुनाऐं ।

 

आ रहें हैं सात दसकों से शिलायें पीसते हम ,

लोग पत्थर के हुए हैं मर गयी संवेदनाऐं ।

 

रोज विष का पान करती रो रही गंगा हमारी ,

युक्तियां पायी नहीं जो रोक दें दूषित प्रथाऐं।

 

काव्य भाषा छंद वाला रुक गया साहित्य का रथ ,

मंच से कुछ नामधारी व्यर्थ करते व्यंजनाऐं।

 

कौन समझेगा हमारी कौम की अंतर्व्यथा  को ,

यंत्र युग में मंत्र अपनी खो चुके नैतिक ऋचाऐं ।

 

दर्द दुनिया में हमारा कौन जानेगा बताओ ,

पाठकों को खोजती हैं अब किताबों में कथाऐं।

 

सात तारे आशमा के क्षुब्ध दिखता चंद्रमा भी ,

सभ्यता से लुप्त होती दिख रही वैदिक विधाऐं।

 

मौन वृत धारण किया है मध्यमा औ वैखुरी ने ,

नाद पश्यंती ,परा का मौन “हलधर” गर्जनाऐं।

– जसवीर सिंह हलधर , देहरादून

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