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समर्पित – प्रदीप सहारे

एक छोटा आँफिस,

आँफिस में अर्पित ।

काम के प्रति हमेशा,

तत्पर और समर्पित ।

सुबह से शाम,

दिमाग में बस काम..

काम की पी थी,

ऐसी जनम घुट्टी ।

ना बुट्टी, ना छुट्टी ।

बात भी कम ही,

जैसे की हो कट्टी।

घर में भी न आराम,

बस्का म काम काम..

काम की ऐसी लगन,

हो जाता पूरा मगन ।

अगर कोई आये विघ्न,

काम की तंद्री,

होती भी भग्न  ।

थाेड़ा मुस्कराता,

रहता शांत..

ना झुंझलाहट,ना आकांत।

करता ऐसी बात,

गर्मजोशी से मिलाकर हाथ।

मुस्कराता चेहरा,

दिल भी शांत.. शांत..

होते ऐसे निराले,

काम के प्रति समर्पित,

हर जगह अर्पित…

✍️प्रदीप सहारे, नागपुर , महारष्ट्

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