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कुछ घाव पुराने लगते हैं – किरण मिश्रा

टीस उठे जब अन्तस में, अपने बेगाने लगते हैं।

मुस्कानों का मरहम कम, कुछ घाव पुराने लगते हैं।

आँखें डब डब करती हैं,

रोती है निर्झर सी काया,

निर्जन वन बन गया बुढ़ापा ,

रहा नहीं अपनों का साया,

जिन बच्चों को पालापोसा, अब वो ही टरकाने लगते हैं,

मुस्कानों का मरहम कम,  कुछ घाव पुराने लगते हैं।

कृशकाया जब व्यथित हुई,

तो डाँटों की बौछार हुई

रोपी तो जीवन में खुशियाँ,

पर काँटों की हार हुई,

रोटी के इक टुकड़े पर, सौ सौ  ताने लगते है,

मुस्कानों का मरहम कम,कुछ घाव पुराने लगते हैं।

धन दौलत जो रिश्ते माने,

नही उन्हें अपनों को माया

मीठी बाणी को तरसे हम,

प्रभु ने कैसा दिन दिखाया,

अपनी जायी सन्तानें ही, क्यूँ अनजाने लगते हैं,

मुस्कानों का मरहम कम, कुछ घाव पुराने लगते हैं।

#डा किरणमिश्रा स्वयंसिद्धा, नोएडा, उत्तर प्रदेश

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