सुबह और शाम अंधेरा जिदगी में कहते हो दिवाली आई।
खाली बर्तन फूटी कौड़ी नहीं जेब कहते हो दिवाली आई।
फटी चादर फूटी किस्मत टूटी चारपाई चुती हुई छत।
पुराने बक्से में सालों से पड़ा हुआ किस्मत का फटा खत।
कर्ज के बोझ से दबी हुई जिंदगी कहते हो दिवाली आई।
बस्ती में हर तरफ रोशनी की चकाचौंध अंधेरा झोपड़ी में।
अनसुलझी उलझने उलझती हुई किस्मत झमेला खोपड़ी में।
गरीबी की दलदल में फंसी जिदगी कहते हो दिवाली आई।
दिल का तेल नसीब का दिया जलाया है मैने घर में।
उलझनों की फुलझड़ी कर्ज का पटाखा जलाया है मैने घर में।
धैर्य की मिठाई खाई जिंदगी में कहते हो दिवाली आई।।
– श्याम कुंवर भारती *, बोकारो, ,झारखंड