कातिक मास हवे पवित्तर
बरतीन छठ पूजन जाय।
गंगा के पनिया बहे बड़ा शितल,
बरतीन अरघीया के जाय।
पियरी पहिन बरतीन करेली बरतिया,
नहाय खाय खरना के जाय।
सूरज देव देई के अरघिया,
छठ मइया होइहे सहाय।
भोर भिन्सरवा बरतीन छठ घाट जाई।
शीतल पनिया नहाए के जाय।
पारण करी पूरा होई छठ बरतिया
छठी मइया मनसा पुरण होई जाय।
– श्याम कुंवर भारती (राजभर)*
बोकारो,झारखंड,9955509286