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दरभंगा महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर नारायण सिंह को मरणोपरांत मिलेगा ‘मिथिला गौरव राष्ट्र रत्न सम्मान’, युवराज कपिलेश्वर सिंह होंगे ‘मिथिला रत्न सम्मान’ से सम्मानित

neerajtimes.com दरभंगा/मुजफ्फरपुर। मिथिला की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत, भारतीय सभ्यता के संरक्षण तथा राष्ट्र निर्माण में ऐतिहासिक योगदान देने वाले दरभंगा राज के महाराजाधिराज डॉ. कामेश्वर नारायण सिंह को मरणोपरांत ‘मिथिला गौरव राष्ट्र रत्न सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा। वहीं, उनके प्रपौत्र यशस्वी युवराज कुमार कपिलेश्वर सिंह को धार्मिक प्रतिष्ठानों तथा मिथिला की समृद्ध संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके योगदान के लिए ‘मिथिला रत्न सम्मान’ प्रदान किया जाएगा।यह सम्मान अखिल भारतीय तुलसी साहित्य विकास एवं नव काव्य सृजन परिषद, रैनी, मुजफ्फरपुर की ओर से प्रदान किया जाएगा। सम्मान समारोह की तिथि एवं स्थान का निर्धारण परिषद की आगामी बैठक में किया जाएगा। इस आशय की जानकारी परिषद के संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष, सुप्रसिद्ध कवि-साहित्यकार विद्या वाचस्पति डॉ. विजय कुमार पाठक ‘प्रसून’ ने दी। डॉ. पाठक ने कहा कि दरभंगा महाराजाओं का भारतीय राष्ट्र के नवनिर्माण में योगदान इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित है। शिक्षा, साहित्य, कला, संस्कृति, राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन तथा स्वास्थ्य सहित अनेक क्षेत्रों में उनके योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता। उन्होंने धार्मिक प्रतिष्ठानों के निर्माण, संरक्षण एवं संवर्धन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी दानशीलता, त्याग और लोककल्याण की भावना ने समाज को अनेक रूपों में समृद्ध किया।

उन्होंने कहा कि दरभंगा राज के महाराजाधिराज ने भारत माता की सेवा एवं राष्ट्रहित के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया। ऐसे महापुरुषों के ऐतिहासिक योगदान का स्मरण करना केवल अतीत का सम्मान करना नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी को सेवा, त्याग, परोपकार और कर्तव्यनिष्ठा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना भी है। डॉ. पाठक ने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि उनके विचार में, दरभंगा राज के ऐसे महान योगदान को अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाया है। परिषद की ओर से युवराज कुमार कपिलेश्वर सिंह को ‘मिथिला रत्न सम्मान’ से सम्मानित करने का निर्णय भी मिथिला की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति सम्मान का प्रतीक है। डॉ. पाठक के अनुसार, धार्मिक प्रतिष्ठानों तथा मिथिला की गौरवशाली संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके योगदान को देखते हुए यह सम्मान प्रदान किया जाएगा। मिथिला की धरती सदियों से ज्ञान, साधना, साहित्य, दानशीलता और आध्यात्मिक चेतना की संवाहक रही है। ऐसे सम्मान उन विभूतियों के योगदान को स्मरण करने का माध्यम हैं, जिनके कार्यों से समाज को सेवा, सद्भाव, संस्कृति-संरक्षण और लोककल्याण की प्रेरणा मिलती है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों को अपनी ऐतिहासिक जड़ों, सांस्कृतिक मूल्यों और आध्यात्मिक विरासत के प्रति जागरूक करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है।    रिपोर्ट – कुमार संदीप

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