neerajtimes.com – मुजफ्फरपुर, बिहार(कुमार संदीप)। हिंदी-भोजपुरी, बज्जिका साहित्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के साथ नवोदित रचनाकारों का मार्गदर्शन करना भी है उनकी साहित्यिक साधना का महत्वपूर्ण पक्ष। साहित्य सेवा को जीवन का ध्येय बनाकर हिंदी, भोजपुरी और लोकभाषाओं को वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठित करने वाले ई० (डॉ.) दिनेश प्रसाद सिन्हा बहुआयामी प्रतिभा, अदम्य संघर्ष, गहन साहित्यिक साधना और सहज विनम्रता के प्रेरक उदाहरण हैं। वैशाली जिले के भगवानपुररत्ती गांव में 11 मई 1968 को जन्मे डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा ने अपनी कर्मभूमि मुजफ्फरपुर को बनाकर साहित्य जगत में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान स्थापित की है।
विज्ञान और साहित्य का अनूठा संगम- – डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा का व्यक्तित्व तकनीकी ज्ञान और साहित्यिक संवेदना का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग में स्नातक, पी.जी.डी.सी.ए. तथा हिंदी में स्नातकोत्तर और पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। हिंदी, भोजपुरी और लोकभाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके योगदान के लिए काशी हिंदी विद्यापीठ, वाराणसी द्वारा उन्हें ‘विद्या-वाचस्पति’ की मानद उपाधि से विभूषित किया गया।
उनकी साहित्यिक यात्रा संघर्षों के बीच आगे बढ़ी। अपनी रचनाओं के 42 बार अस्वीकृत होने के बावजूद उन्होंने धैर्य नहीं खोया। अंततः वर्ष 1984 में उनकी पहली रचना प्रतिष्ठित बाल पत्रिका ‘नंदन’ में प्रकाशित हुई। अनमोल साहित्यकार मदन कश्यप और उनकी बहन शारदा रानी की प्रेरणा ने उनकी लेखन-यात्रा को नई दिशा दी। इसके बाद उन्होंने निरंतर साहित्य सृजन करते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
पुस्तकों से अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहचान- – डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा की प्रमुख प्रकाशित कृतियों में ‘मेरी 30 कविताएँ’, ‘कोयला का आँचल’, ‘माइके लाज रखी’, ‘झरिया की यादें’, ‘तितकी खोजेला’, ‘बिखरे रिश्ते और बिखरे पन्ने’, ‘विश्व पटल पर भोजपुरी के अग्रदूत’ तथा ‘भोजपुरी के इनसाइक्लोपीडिया (डॉ. ब्रज भूषण मिश्र)’ शामिल हैं। उन्होंने भोजपुरी फिल्मों के लिए गीत लेखन तथा टेलीविजन धारावाहिकों में सहायक गीतकार के रूप में भी योगदान दिया है। दूरदर्शन और आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों से उनके काव्य-पाठ एवं व्याख्यान प्रसारित होते रहे हैं।
विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने साहित्यिक गतिविधियों को व्यापक विस्तार दिया है। उन्हें 19 देशों की साहित्यिक यात्राओं तथा नौ अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में सहभागिता का अवसर मिला। राष्ट्रपति के स्वागत-गान में सहभागिता, मलावी के उच्चायुक्त द्वारा तीन बार सम्मानित होना तथा हिंदी सोसायटी सिंगापुर अवॉर्ड, वातायन इंटरनेशनल अवॉर्ड (लंदन), आचार्य गौरी शंकर पाण्डेय अंतरराष्ट्रीय वाङ्मय सम्मान और दिनकर खोज पुरस्कार सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित होना उनकी उपलब्धियों के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
नवोदित रचनाकारों के मार्गदर्शक भी हैं डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा- – डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा की विशेषता केवल उनकी साहित्यिक उपलब्धियां ही नहीं, बल्कि नवोदित रचनाकारों के प्रति उनका आत्मीय व्यवहार भी है। मुजफ्फरपुर साहित्य महोत्सव में पहली बार उनसे मिलने का अवसर प्राप्त करने वाले युवा रचनाकार कुमार संदीप के अनुसार, डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा ने मंच से ही नहीं, बल्कि श्रोता दीर्घा में बैठकर नए कवियों की रचनाएं ध्यानपूर्वक सुनीं और उनकी खूबियों एवं कमियों को रेखांकित करते हुए उचित मार्गदर्शन दिया। उनका यह व्यवहार नए रचनाकारों के प्रति उनके समर्पण और साहित्यिक उत्तरदायित्व को दर्शाता है।
नवोदित लेखकों को उनकी सलाह है कि साहित्य सृजन में धैर्य, मौलिकता और अपनी विशिष्ट शैली का विशेष महत्व है। भाषा पर पकड़, शुद्ध उच्चारण, सटीक बिंबों का प्रयोग तथा रचना के बार-बार स्वमूल्यांकन को वे गुणवत्तापूर्ण लेखन की आवश्यक शर्त मानते हैं। उनका मानना है कि रचनाकार को किसी भी रचना के प्रकाशन से पहले निष्पक्ष पाठक बनकर उसकी समीक्षा करनी चाहिए, ताकि त्रुटियों का परिमार्जन हो सके और रचना अधिक प्रभावशाली बन सके।
सफलता के बीच विनम्रता ही व्यक्तित्व की असली पहचान- – अनेक उपलब्धियों और सम्मानों के बावजूद डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा की सहजता एवं विनम्रता उन्हें विशिष्ट बनाती है। वे अपनी सफलता को पूर्वजों के स्नेह, संस्कार और आशीर्वाद का परिणाम मानते हैं। माता-पिता के प्रति उनकी श्रद्धा और अपनी जड़ों से जुड़ाव उनके व्यक्तित्व के मानवीय पक्ष को उजागर करता है। वर्तमान में मुजफ्फरपुर के भगवानपुर स्थित अलकापुरी में रहकर साहित्य साधना में सक्रिय डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा हिंदी, भोजपुरी और अन्य लोकभाषाओं के संवर्धन के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि अस्वीकृतियां किसी साधक की राह रोक नहीं सकतीं, यदि उसके भीतर धैर्य, परिश्रम और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट निष्ठा हो।
युवा रचनाकार कुमार संदीप के शब्दों में, डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा जैसे साहित्य-साधक नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उनकी साहित्यिक यात्रा, संघर्षशीलता और विनम्र व्यक्तित्व आने वाले समय में भी रचनाकारों को मौलिक लेखन, निरंतर अभ्यास और समाज के प्रति साहित्यिक दायित्व निभाने की प्रेरणा देता रहेगा।
रिपोर्ट एवं आलेख: कुमार संदीप ग्राम सिमरा, प्रखंड बंदरा, जिला मुजफ्फरपुर, बिहार।