लिए कंधों पे जिम्मेदारियों को,
ओ मां फौलाद सी मजबूत ठहरी।
बड़ी बेबस निठुर लाचारियां है,
मगर ममता से ओ मजबूर ठहरी।
मिटानी भूख निष्ठुर पेट की थी।
फगुनियां तोड़ने पत्थर चली फिर।
विधाता ने दिया उसको भी जीवन,
मगर किस्मत से ओ मजदूर ठहरी।
-सीमा शुक्ला अयोध्या, उत्तर प्रदेश