neerajtimes.com – अग्नि का स्पर्श होते ही, चिता धू धू कर जल उठी। चिता को घेरकर कुछ लोग खड़े थे। गीतिका चिता से दूर खड़ी थी।
श्मशान में नीरवता छाई हुई थी। वातावरण में अजीब सी खामोशी थी। चिता में जलती लकडिय़ों के चटखने की आवाज वातावरण की शांति को भंग कर रही थी।
‘ना जाने कौन था,बेचारा?’ चिता के पास खड़े लोगों में से एक बोला था, ‘सुरेश की नजर न पड़ती तो लाश की जाने क्या दुर्गति होती?’
‘इस कलयुग में भी सुरेश जैसे लोग मौजूद हैं। दूसरा आदमी बोला।
‘आजकल अपने का ही क्रिया कर्म करना लोगों को भारी पड़ता है। सुरेश महान है, जो एक लावारिस लाश का क्रिया कर्म पूर्ण सम्मान से कर रहा है।’
मरने वाला यहां के लोगों के लिए लावारिस था। वह कौन है? कहां का रहने वाला है? उसका नाम क्या है? कोई नहीं जानता था।
जो लोगों की नजरों में लावारिस था, वह गीतिका के लिए लावारिस नहीं था। न ही अनजान।
सुरेश के लिए भी वह पराया था।
लेकिन गीतिका के लिए?
आज वह गीतिका के लिए भले ही पराया हो, परंतु एक दिन वह उसका अपना था। सुरेश से पहले वही उसका सर्वस्व था।
आग धीरे धीरे चिता के चारों ओर फैल चुकी थी। आग की लपटों से उठते धुएं के बीच उसे उस आदमी की धुंधली सी आकृति नजर आई। धीरे धीरे ऐसा लगा, आग की लपटें गायब हो रही है और एक आकृति उभर रही है। गीतिका को ऐसा लगा, चिता पर लेटा आदमी फिर से जीवित हो उठा है।
गीतिका का जन्म मिडिल क्लास परिवार में हुआ था। उसके पिता रेलवे में बाबू थे। वे चार भाई बहन थे। गीतिका के बी ए पास करते ही उसके पिता ने उसके लिए वर की तलाश शुरू कर दी। कुछ दिनों के प्रयास के बाद उन्हें देवेन मिल गया। देवेन दिल्ली में एक कंपनी में काम करता था। उसके मां बाप गुजर चुके थे। कोई भाई बहन नहीं था। इसलिए उस पर किसी तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं थी। बेटी ससुराल में जाकर राज करेगी। कोई हुक्म देने वाला नहीं होगा। यह सोचकर पिता ने उसका रिश्ता देवेन से कर दिया।
रिश्ता होने से पहले देवेन उसे देखने आया था। शादी से पहले उसे बताया गया था कि देवेन में कोई बुरी आदत नहीं है। गीतिका जब पहली बार उससे मिली तब उसे भी देवेन भला और शरीफ लगा। वह उससे बात करते हुए भी झिझक रहा था।
गीतिका ने जैसा सुना, और पहली बार मिलने पर जैसा सोचा, शादी के बाद बिलकुल विपरीत पाया था। उसे दारू के साथ जुए और सट्टे की बुरी लत थी। उसकी महीने की कमाई उसके इन्हीं शौक पूरे करने में चली जाती।
शादी के बाद गीतिका ने अपने प्यार के बल पर पति की सब बुराई छुड़ानी चाही। गीतिका के रूप और प्यार के वश में होकर देवेन बुरी लत से दूर भी हुआ, पर ज्यादा दिन तक नहीं।
पति की गंदी लत की वजह से उसे घर खर्च चलाने में बेहद तंगी और परेशानी का सामना करना पड़ता। गीतिका के पिता ने अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया था देवेन ने अपने शौक पूरे करने में दहेज में मिली रकम भी उड़ा दी। जब दहेज में मिली नगदी खत्म हो गई,तब धीरे धीरे गहने और अन्य सामान भी बिक गया। जब घर में बेचने के लिए कुछ नहीं बचा, तो लोगों से उधार लेने लगा। वह उधार चुका नहीं पाता था इसलिए लोगों ने उधार देना भी बंद कर दिया।
तब देवेन मायके से पैसे लाने के लिए गीतिका पर दबाव डालने लगा। गीतिका ने जब ऐसा करने से मना कर दिया, तब वह उसे तंग करने लगा। मारने पीटने लगा। उसे तरह तरह से शारीरिक यातना देने लगा, उत्पीडऩ करने लगा।
गीतिका की अभी दो बहनें कुंवारी थी और भाई अभी पढ़ रहा था। उसके पिता को जो तनख़्वाह मिलती, उसमें खर्च ही जैसे तैसे चलता था। जब देवेन के बार बार दबाव देने पर भी गीतिका अपने मायके नहीं गई। तब देवेन ने उस पर जुल्म ढाने में कोई कसर नहीं रखी। इतना करने पर भी गीतिका न झुकी,न टूटी तब उसने उसे पैसे लाने की कहना छोड़ दिया। पति के व्यवहार में आए बदलाव से गीतिका ने सोचा, शायद वह सुधर गया। अब वह उसे मारता पिटता नहीं था, और बात भी हंसकर करता। एक दिन वह घर आते हि बोला,’जल्दी तैयार हो जाओ। हमें चलना है।’
‘कहां?’
‘चलो तो सही।’
देवेन काफी खुश नजर आ रहा था। गीतिका को उसकी खुशी का कारण समझ में नहीं आया। वह पति की खुशी का कारण जानना चाहती थी। पर कहीं, वह नाराज न हो जाए, यह सोचकर चुप रही। और तैयार होकर उसके साथ चल दी।
देवेन उसे एक आलीशान कोठी में ले गया। उस कोठी का मालिक अधेड़ उम्र का था। देवेन उससे बोला,’मेरी पत्नी गीतिका।’
‘आओ।’ सेठ ने दोनों को ड्रॉइंग रुम में बैठाया। उन्हें शरबत पिलाया। फिर देवेन और सेठ उसे ड्राइंग रूम में छोड़कर बाहर चले गए।
कुछ देर बाद सेठ अकेला लौटा और उससे बोला,’आओ।’
गीतिका उसके साथ हो ली। जब सेठ उसे बेडरूम में ले आया, तब वह चौंकी थी,’यह मुझे कहां ले आए?’
‘बेडरूम में।’
‘यहां क्यों?’ वह आश्चर्य से बोली।
‘शादी शुदा हो,’सेठ हंसकर बोला,’इतना भी नहीं जानती, बेडरूम में औरत आदमी क्या करते है?’
‘वो पति पत्नी करते है। मैं आपकी पत्नी नहीं हूँ।’
‘आज रात के लिय मेरी हो। ‘सेठ ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
‘देवेन।’, गीतिका ने जोर से पुकारा।
‘वह नहीं आयेगा, सेठ बोला, ‘वह घर चला गया है।’
‘मुझे यहां अकेला छोड़कर।’
‘हां’, सेठ बोला,’तुम्हारा पति दो हजार रु. में तुम्हे आज रात के लिए मुझे बेच गया है।’
गीतिका सेठ की बात सुनकर हक्की बक्का रह गई। सेठ उसे पलंग की तरफ खींचने लगा। वह उससे छूटने का प्रयास करने लगी। इसी प्रयास में गीतिका ने ऐसा धक्का मारा कि सेठ जमीन पर जा गिरा। इस मौके का फायदा उठाकर वह भाग ली।
‘आ गई’, देवेन कमरे में बैठा शराब पी रहा था, उसे देखकर बोला,’बड़ी जल्दी छोड़ दिया सेठ ने।’
‘उस बूढ़े को ऐसा सबक सिखा कर आई हूं कि किसी औरत की आबरू से खेलने का प्रयास नहीं करेगा।’
‘यह तुमने क्या किया। वह बूढ़ा सेठ मेरा परमानेंट ग्राहक बन जाता।’
‘ग्राहक’, पति की बात सुनकर गीतिका घृणा से बोली,’चंद नोट की खातिर पत्नी को बेच आए।’
‘इसमें बुराई क्या है’, देवेन बेशर्मी से बोला, ‘जो मेरे साथ करती हो, सेठ के साथ कर लोगी तो क्या हो जाएगा।’
‘शर्म नहीं आ रही, यह सब कहते हुए। अपनी पत्नी से धंधा कराकर अपने शौक पूरे करना चाहते हो। डूब मरो।’
‘बाप से मांग कर नहीं ला सकती। कमा सकती नहीं। ऊपर से जुबान चलाती है’, कहकर देवेन उस पर लात घू़ंसे बरसाने लगा। जब मारते मारते थक गया, तब उसे घर से बाहर निकालते हुए बोला, ‘मुझसे मरने का कहती है, तू मर जा, जिससे मुझे मुक्ति मिले।’
देवेन ने गीतिका को घर से बाहर निकाल कर दरवाजा बंद कर लिया। गीतिका ने सोचा, ऐसी जिंदगी से क्या फायदा जिसमें रोज जलालत सहन करनी पड़े। इससे तो मौत बेहतर है।
और वह आत्महत्या का इरादा करके चल पड़ी। वह शहर से दूर लाइन के किनारे आ गई। तभी उसे इंजन की सीटी की आवाज सुनाई दी, जिसे सुनकर वह लाइन के बीच आ गई। ट्रेन सामने से दौड़ी चली आ रही थी। ज्यों ज्यों ट्रेन आगे आ रही थी, उसकी जिंदगी और मौत के बीच फासला कम हो रहा था। लेकिन ट्रेन उसके ऊपर से गुजरती उससे पहले किसी ने उसे बाहों में भरकर छलांग लगा दी। वह उसके साथ लुढ़कती हुई दूर तक चली गई। और ट्रेन गुजर गई।
‘कौन हो तुम!’गीतिका उठते हुए बोली,’तुमने मुझे क्यों बचाया?’
‘जीवन भगवान की देन है, उसे मिटाने का तुम्हें कोई हक नहीं।’ वह बोला।
‘तुम पुरुष हो, औरत का दर्द क्या जानो।’
‘दुख,दर्द,पीड़ा, परेशानी ये चीजें औरत आदमी के बीच फर्क नहीं करती। इनसे घबराकर भागना कायरता है’, वह उसे समझाने की भाषा में बोला,’हिम्मत से काम लो। सब ठीक हो जाएगा।’
‘उपदेश देना आसान है,’ वह रोने लगी। वह उसे चुप कराने का प्रयास करने लगा। जब उसका रोना थमा तब वह बोला,’मुझे बताओ तुम्हें ऐसा क्या दुख है, जो तुम आत्महत्या करने चली आई।’
गीतिका ने उसे अपनी आपबीती सुना दी। उसकी दर्द भरी कहानी सुनकर बोला,’मेरे साथ चलो।’
‘कहां?’
‘मेरे घर’
और वह उसे लखनऊ ले आया।
सुरेश लेखक था। गीतिका उसके साथ रहने लगी।
सुरेश ने गीतिका की आपबीती पर एक उपन्यास लिखा। सुरेश मामूली लेखक था, लेकिन इस उपन्यास ने उसे रातों रात एक सफल नामी लेखक बना दिया। गीतिका सुरेश की प्रेरणा बन गई। वह उसे सुझाव देती और नए विचार भी।
साथ रहते हुए वे करीब आते गये। इतने करीब कि एक दिन वह सुरेश से बोली, ‘मेरे दिन चढ़ गए है।’
‘यह तो अच्छी बात है’ सुरेश खुश होते हुए बोला,’तुम मां बनने वाली हो।’
‘यह तो सोचो लोग क्या कहेंगे?’
गीतिका की बात को वह समझ गया और उसने उससे कोर्ट मैरिज कर ली।
गीतिका को पहले पति देवेन से दुख ही दुख मिला था, जबकि सुरेश से प्यार ही प्यार।
सुरेश बाहर आता जाता, अक्सर गीतिका को भी साथ ले जाता।
आज वे कार से मेरठ जा रहे थे। सुरेश कार ड्राइव कर रहा था। अचानक झटके के साथ कार रुकी तो गीतिका बोली, ‘क्या हुआ?’
सुरेश बोला नहीं, कार से नीचे उतरा। गीतिका भी कार से नीचे उतर आई। सड़क के किनारे एक आदमी औंधे मुंह पड़ा था। सुरेश ने उसकी नब्ज देखी। नब्ज देखकर उसके चेहरे का रंग उतर गया।
‘क्या बात है?’
‘यह तो मर गया।’
‘मर गया,’ गीतिका आश्चर्य से बोली,’दूर हटो उससे।’
‘क्यों!’
‘न जाने कौन है? कैसे मरा है? हम और पुलिस के चक्कर में फंस जायेगे।’
‘तुम्हारा मतलब है पुलिस के डर से मानवता भूल जाऊं।
“मैं कोई पचड़े में पड़ना नहीं चाहती।’
‘लोगों की बात छोड़ो। मेरा साहित्यिक मन इजाजत नहीं देता कि मैं इसे ऐसे ही छोड़कर चला जाऊं?’
गीतिका पति की बात सुनकर चुप हो गई। सुरेश ने जमीन पर पड़े आदमी को सीधा किया। गीतिका उस पर नजर पड़ते ही चौंक गई।
‘यह तो देवेन है।’
‘कौन देवेन?’
‘वो ही दुष्ट जिसके अत्याचार ने मुझे आत्महत्या को मजबूर किया।’
‘तुम्हारा भूतपूर्व पति।’
‘हां, वही कसाई,’ गीतिका नफरत से बोली,’इस दुष्ट नीच को पड़ा रहने दो। चील कव्वों को इसकी देह को नोचने दो।’
‘तुम्हारा गुस्सा बेकार है। उसके साथ उसके पाप कर्म चले गए। अब तो मृत देह हैं।’
‘तुम क्या जानो उसने मेरे साथ क्या क्या किया है।’
‘तुम्हारे दर्द को समझता हूं, पर अब गुस्सा बेकार है।’
‘मेरी मानो तो इसे ऐसे ही छोड़ चलो।’
‘इसमें बड़प्पन नहीं है,’सुरेश समझाते हुए बोला,’मेरा उससे संबंध नहीं है, पर तुम्हारा पति रह चुका है। लोग अनजान लाश की भी दुर्गति नहीं चाहते और तुम पूर्व पति की देह की भी अनदेखी करना चाहती हो।’
‘क्या करना चाहते हो?’
‘देवेन कैसा भी था। अब चाहे हमारा संबंध न हो। लेकिन हमारा कर्तव्य है, उसके शरीर की दुर्गति न होने दे’ सुरेश बोला, ‘मैं इसका क्रिया कर्म करूंगा।’ आज सुरेश के सम्मान में कार्यक्रम था, जिसे स्थगित करके वह देवेन का क्रिया कर्म करने लगा।
‘आओ चले,’ सुरेश की आवाज ने उसे अतीत से वर्तमान में ला दिया। देवेन का शरीर शून्य में विलीन हो गया। सब जाने लगे। गीतिका साथ चलते हुए सुरेश के बारे में ही सोच रही थी। सुरेश देवता था। वह न होता तो देवेन की लाश की दुर्गति होती। सुरेश की सज्जनता और देवेन की दुष्टता का कोई मेल नहीं था। वह दो किनारों में उलझी मानव मन की अपरिमेय मनो स्थिति के बारे में सोच रही थी। (विभूति फीचर्स)