( 1 ) जैसा मन हो
हो वैसी वाणी ही,
और हो कथनी जैसी…,
हो वैसा ही कार्य हमारा यहीं !!
( 2 ) मन वाणी में
सदैव बनाए चलें एकरूपता,
और वही करें, जो हम कहें….,
हो हमारे जीवन विचारों में सम्यकता !!
( 3 ) मन अंतस में
बैठे हैं श्रीप्रभु हमारे,
करें उनकी सदप्रेरणा से कार्य…,
और करते चलें अर्पित इन्हें फल सारे !!
( 4 ) चित्त की शुद्धता
श्रीहरि के दर्शन कराए,
और अंतःकरण की पवित्रता…,
जीवन में यथोचित परिणाम दिलाए !!
( 5 ) चलें अपनाए त्रिरत्न
सम्यक ज्ञान चरित्र दर्शन,
और बैठकर श्रीहरिचरणों में…,
करते चलें आत्मसाक्षात्कार प्रतिदिन !!
– सुनील गुप्ता (सुनीलानंद), जयपुर, राजस्थान