मनोरंजन

सरकारें आएँगी, जाएँगी – मीनू कौशिक

कोई राष्ट्रवाद , कोई समाजवाद ,

कोई लोकतंत्र को ढाल बना ,

सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।

 

सरकारें रचतीं हैं चक्रव्यूह , जनता फँसकर रह जाती है ।

अभिमन्यु-वध होता निशदिन ,पाँचाली शोर मचाती है ।

कोई नारीवाद ,कोई साम्यवाद ,

कोई भ्रष्टतंत्र को ढाल बना ,

सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।

 

कोई मुस्लिम को तुष्ट करे ,तो कोई हिंदू को पुष्ट करे ।

कोई दलित हमदर्दी बनाकर , सवर्ण वर्ग को रुष्ट करे ।

बंँटवारे की राजनीति ,

कोई आतंकतंत्र को ढाल बना

सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।

 

ये खेल सदा चला आया , ऐसे ही चलता जाएगा ।

शोषण का दानव सदियों से , ऐसे ही पलता जाएगा ।

कुतर्क और कुचालों के ,

इस धूर्ततंत्र को ढाल बना ,

सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।

 

व्यवस्थाएँ ठीक नहीं करनी ,इनके दाम से ही तो जीतेंगे।

मुफ्त रेवड़ियाँ खाकर ही , सरकार की ढफली पीटेंगे ।

अज्ञान , अशिक्षा अंधकार के ,

मूर्खतंत्र को ढाल बना ,

सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।

 

हमसे पीछे आजाद हुए ,वे हमसे आगे निकल गए ।

वे सदियों पीछे थे हमसे , हम मीलों पीछे फिसल गए ।

अंधविश्वास गर्त गहराया है ,

विज्ञान को धता बताता है ,

जब मंत्रतंत्र को ढाल बना ,

सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।

 

अब जागे जनता होश करे , क्या इसी नरक में जीना है ?

जनसंख्या, भ्रष्टाचार भरा विष , घूट-घूटकर पीना है ?

हालात कभी सुधरेंगे क्या ??

ये देश कभी बदलेगा भी ??

जब षड्यंत्रों को ढाल बना ,

सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।

✍️ मीनू कौशिक “तेजस्विनी”, दिल्ली

Related posts

गांव की बेटी हूं – ममता जोशी

newsadmin

गीत – जसवीर सिंह हलधर

newsadmin

रक्षा बंधन (भोजपुरी) – श्याम कुंवर भारती

newsadmin

Leave a Comment