कोई राष्ट्रवाद , कोई समाजवाद ,
कोई लोकतंत्र को ढाल बना ,
सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।
सरकारें रचतीं हैं चक्रव्यूह , जनता फँसकर रह जाती है ।
अभिमन्यु-वध होता निशदिन ,पाँचाली शोर मचाती है ।
कोई नारीवाद ,कोई साम्यवाद ,
कोई भ्रष्टतंत्र को ढाल बना ,
सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।
कोई मुस्लिम को तुष्ट करे ,तो कोई हिंदू को पुष्ट करे ।
कोई दलित हमदर्दी बनाकर , सवर्ण वर्ग को रुष्ट करे ।
बंँटवारे की राजनीति ,
कोई आतंकतंत्र को ढाल बना
सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।
ये खेल सदा चला आया , ऐसे ही चलता जाएगा ।
शोषण का दानव सदियों से , ऐसे ही पलता जाएगा ।
कुतर्क और कुचालों के ,
इस धूर्ततंत्र को ढाल बना ,
सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।
व्यवस्थाएँ ठीक नहीं करनी ,इनके दाम से ही तो जीतेंगे।
मुफ्त रेवड़ियाँ खाकर ही , सरकार की ढफली पीटेंगे ।
अज्ञान , अशिक्षा अंधकार के ,
मूर्खतंत्र को ढाल बना ,
सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।
हमसे पीछे आजाद हुए ,वे हमसे आगे निकल गए ।
वे सदियों पीछे थे हमसे , हम मीलों पीछे फिसल गए ।
अंधविश्वास गर्त गहराया है ,
विज्ञान को धता बताता है ,
जब मंत्रतंत्र को ढाल बना ,
सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।
अब जागे जनता होश करे , क्या इसी नरक में जीना है ?
जनसंख्या, भ्रष्टाचार भरा विष , घूट-घूटकर पीना है ?
हालात कभी सुधरेंगे क्या ??
ये देश कभी बदलेगा भी ??
जब षड्यंत्रों को ढाल बना ,
सरकारें आएँगीं , जाएँगीं ।।
✍️ मीनू कौशिक “तेजस्विनी”, दिल्ली