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गाँवों की गोद में बसा असली हिंदुस्तान – विवेक रंजन श्रीवास्तव 

neerajtimes.com – भारत का असली चेहरा, उसकी आत्मा और धड़कन हमारे गाँवों में बसी है। महानगरों की चकाचौंध भले ही सुर्खियाँ बटोरे, पर हिंदुस्तान की सच्ची विविधता, उसकी आस्था, संघर्ष और विजय यहीं की मिट्टी में पनपती है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि आज भी जीते-जागते गाँवों का यथार्थ है । श्रीलाल शुक्ल के प्रसिद्ध उपन्यास रागदरबारी की शुरुआत इस तरह होती है, ” महानगर का किनारा, उसे छोड़ते ही देहात का महासागर शुरु हो जाता है….
यह जानना सुखद है कि भारत में अभी भी गांव है जहाँ बिना दरवाजे के घर हैं, साँप परिवार के सदस्यों जैसे हैं, जुड़वाँ बच्चे वैज्ञानिकों को चुनौती देते हैं, और हर घर से कोई न कोई सैनिक निकलता है। आइए, ऐसे ही अनूठे गाँवों के बारे में जाने।
महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में सदियों से घर बिना दरवाजों के थे। शनि देव की कृपा से यहाँ चोरी का भय नहीं होता। हालाँकि अब बदलते समय के साथ घरों और दुकानों में आधुनिकता के चलते दरवाजे लगने लगे हैं, फिर भी मंदिर, दुकान ,घर बिना ताले के होना विस्मयकारी है। यहाँ विश्वास ही सबसे बड़ा दरवाजा और संयम ही ताला था ।
महाराष्ट्र राज्य के ही सोलापुर ज़िले में स्थित शेटफळ एक ऐसा गाँव है, जहाँ विषधर नाग अधिकांश परिवारों का अभिन्न हिस्सा हैं। यहाँ कोबरा स्वतंत्र विचरते हैं और उन्हें मारना वर्जित माना जाता है।
महाराष्ट्र में ही अहमदनगर का हिवरे बाज़ार है, जो कभी सूखे से जूझता था। आज यह गाँव जल संरक्षण और लोगों की मेहनत की बदौलत महाराष्ट्र का सबसे धनी गाँव बन चुका है, जहाँ 60-80 परिवार करोड़पति हैं और गरीबी का नामो-निशान नहीं।
गुजरात के साबरकांठा में स्थित पंसारी गाँव आधुनिक ग्राम-विकास की जीती-जागती मिसाल है। यहाँ 24 घंटे वाई-फाई, सीसीटीवी कैमरे, सोलर लाइट्स और पक्की नालियाँ हैं,शहरों से होड़ लेता यह गाँव साबित करता है कि सुविधाएँ किसी महानगर की मोहताज नहीं।
वहीं, गिर के जंगलों से सटे जम्बूर में सिद्दी समुदाय बसता है। अफ्रीकी मूल के ये लोग पुर्तगाली नाविकों के वंशज हैं, आज पूरी तरह भारतीय हैं और गुजराती बोलते हैं। उनकी हस्तकला, नृत्य और जीवनशैली इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि समावेशी विविधता ही भारत की पहचान है।
राजस्थान का कुलधरा गांव आज भी अपने रहस्य में लिपटा है। यह गाँव रातों रात खाली हो गया था । कोई कहता है शाप, कोई कहता है अत्याचार। खंडहरों में तब्दील यह बस्ती मौन होकर भी बहुत कुछ कहती है।
केरल के मलप्पुरम में कोडिन्ही का गाँव वैज्ञानिकों के लिए पहेली बना हुआ है। यहाँ 300-400 जोड़ियाँ जुड़वाँ बच्चों की हैं, यानी प्रति हज़ार जन्मों पर 45 जुड़वाँ बच्चों का होना अजब गजब बिरला है।जो वैश्विक औसत से कई गुना अधिक है। अब तक इसका कोई वैज्ञानिक कारण नहीं खोजा जा सका है।
कर्नाटक के शिवमोग्गा में मत्तूर नामक गाँव संस्कृत बोलता है। यहाँ की दैनिक बातचीत में संकेथि के साथ संस्कृत का प्रचलन है। हालाँकि पूरा गाँव शत-प्रतिशत संस्कृतभाषी नहीं, फिर भी यह प्राचीन भाषा को जीवित रखने का अनुपम प्रयास है।
बिहार के कैमूर में बरवाँ कला को पचास वर्षों तक ‘कुंवारों का गाँव’ कहा गया। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और गरीबी के कारण यहाँ कोई अपनी बेटी ब्याहने को तैयार नहीं होता था। 2017 में यहाँ पहली शादी हुई और तब से धीरे-धीरे इस गाँव की बदहाली भी पीछे छूट रही है।
मेघालय का मावलिननोंग एशिया का सबसे स्वच्छ गाँव है। बाँस के डस्टबिन, प्राकृतिक कम्पोस्ट और पत्तों से बनी थालियाँ यहाँ की जीवनशैली का हिस्सा हैं। बेलेंसिंग रॉक आज भी प्रकृति के संतुलन का अद्भुत उदाहरण है। (मध्यप्रदेश में जबलपुर में भी बैलेंसिंग राक है)
असम के रोंगडोई में आज भी मेंढकों का विवाह रचाया जाता है , यह लोकआस्था और कृषि-निर्भरता का अनूठा संगम है। जहाँ वर्षा के लिए यह रस्म निभाई जाती है।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में कोरलई नामक गाँव की अपनी भाषा है,क्रियोल पुर्तगाली, जो औपनिवेशिक विरासत की जीवित गवाही है। सुदूर छत्तीसगढ़ में पुर्तगाली भाषा का प्रयोग गांव को खास पहचान दिलाता है।
और फिर है गहमर। उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर में बसा यह गाँव , एशिया का सबसे बड़ा ग्राम है। जहाँ डेढ़ लाख से अधिक आबादी रहती है,पर रिकॉर्ड में गहमर गांव ही है। यहाँ हर घर से कोई न कोई सैनिक निकला है। पंद्रह हज़ार से अधिक पूर्व सैनिक, और कारगिल से लेकर प्रथम विश्वयुद्ध तक के योद्धाओं की गाथाएँ यहाँ की हर गली में बसी हैं।
ये विशिष्ट गाँव केवल भौगोलिक बस्तियाँ नहीं हैं। ये भारत के वे दर्पण हैं, जिनमें हमारी आस्था, हमारा संघर्ष, हमारी वैज्ञानिक जिज्ञासा और हमारा सैनिक बल झलकता है। महानगरों की ऊँची इमारतों में नहीं, बल्कि इन गाँवों की गोद में ही असली हिंदुस्तान बसा है। (विभूति फीचर्स)

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