विंध्या घाटी से निकली है ,जगती की अमर निशानी है ।
यमुना की सखी कहाती है ,विंध्याचल सुता सयानी है ।।
ये देवलोक की परी नहीं , अभिशप्त नदी कहलाती है ।
रतिदेव अनाचारों का यह, कर्जा हर रोज चुकाती है ।।
इसने अपने पावन जल से ,संपूर्ण मालवा सींचा है।
कोटा रावत भाटा का भी , जनजीवन अब तक खींचा है ।।1
द्वापर में इसने देखा है ,कौरव पांडव का चाल चलन ।
क्रोधित पांचाली देखी है ,देखा है उसका चीर हरण ।।
जब भी अतीत के गहवर से , यादें इसकी टकराती हैं ।
विक्रमादित्य के राज काज, जगती को याद दिलाती हैं ।।
देखा इसने आदित्य राज , प्रभाकर वर्धन देखा है ।
रावल का संगर देखा है , हूणों का मर्दन देखा है ।।2
देखा सौंदर्य पद्मनी का , जौहर की देखी है ज्वाला ।
गोरा बादल संगर देखा,देखा है राणा का भाला ।।
इसके बीहड़ ने देखा है , धूमिल होता इतिहास यहां।
मंगोलों और पठानों का ,बनता देख आवास यहां ।।
कोटा बूंदी जैसी नगरी , घाटों पर बनती देखी हैं ।
रणभेरी बजती देखी है ,तलवारें तनती देखी हैं ।।3
जाने कितने ही दस्युराज,इसकी दर्रों में सोए है ।
इसके बीहड़ में कितने ही ,बहनों ने भाई खोए हैं ।।
इसके बीहड़ के कण कण में , कितने ही राज समाए हैं ।
कितने ही बागी वीरों ने , बीहड़ में प्राण गंवाए हैं ।।
जाने कितने बलवान वीर, इसके बीहड़ में समा गए ।
शोणित से शुद्ध किया , पैगाम कौम को थमा गए ।।4
सिंधिया वंश का राजतिलक,जाटों का शासन देखा है ।
पुलिस दस्यु मुठभेड़ों का , इसके कण कण में लेखा है ।।
इसके पानी ने मुगलों का , होता निर्वासन देखा है ।
देखे हैं मर्द मराठे भी , अंग्रेजी शासन देखा है ।।
इसकी घाटी के बीहड़ ने , अंग्रेजों को दहलाया था।
बलिदानी वीरों ने इसके बीहड़ का लाभ उठाया था।।5
बांधे है इस पर चार बांध, यमुना से मिलने आती है ।
ये नौ सौ साठ किलोमीटर,धरती की प्यास बुझाती है ।।
इसका प्रदूषण मुक्त नीर, चंबल की शान बढ़ाता है ।
इसके जल में घड़ियालों का , कुनवा रहता इठलाता है ।।
यमुना के जल से शुद्ध नीर,अब इसका माना जाता है ।
यूं राजस्थान मालवा का ,चंबल से गहरा नाता है ।।6
अंग्रेजी शासन में इसको सब, दस्यु कंदरी कहते थे ।
भारत के नामी दस्युराज, इसके बीहड़ में रहते थे।।
अपने पावन जल के कारण, ये विंध्य सुंदरी कहलाती ।
पर्यटन केंद्र जल क्रीड़ा से , अब ये लोगों को बहलाती।।
पार्वती नदी की धारा से, जब चंबल जोड़ी जाएगी ।
अभिशाप मुक्त होगा इसका , कलयुग की गंग कहाएगी ।।7
– जसवीर सिंह हलधर, देहरादून, उत्तराखंड