घाटी फूलोँ की सजी, विविध रंग के फूल।
लगता सुंदर कामिनी, ओढ़े खड़ी दुकूल।।
ओढ़े खड़ी दुकूल, सुरंगी पहने सारी।
ब्रह्मकमल सिर ताज, छवि लगती अति प्यारी।
कहे क्षमा सुन मीत, रहे सुंदर परिपाटी।
गाती राग वसंत, सजे फूलों की घाटी।।
<>
सरसों फूली खेत में, गेंदा स्वर्णिम आभ।
खिली चमेली शान से, उपवन सजे गुलाब।
उपवन सजे गुलाब, आम पर बोरे आई।
ले पल्लव की ओट, पिकी ने तान सुनाई।।
देख सुहानी भोर, मेरे मन तुम भी हरसो।
चलती मंद बयार, खेत में फूली सरसो।। ।।
– डॉ क्षमा कौशिक, देहरादून, उत्तराखंड