बीत गया पच्चीस है,सन् छब्बीस विराज।
एक वर्ष कम जिंदगी,बना रहे सुख साज।
शुभ मंगल है कामना, जीवन हो उत्कर्ष,
चंदन सोहे भाल पर,सजे शीश पर ताज।।
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ईश्वर का प्रतिरूप हैं ,गुरुवर देते ज्ञान।
वार गुरू का आज है,करिए सब जन ध्यान।
बुद्धि-शुद्धि करके सदा, देते शिष्य सँवार,
जिन पर करते हैं कृपा,बनता वही महान।।
– डॉ गीता पांडेय अपराजिता,सलोन,
रायबरेली उत्तर प्रदेश