मनोरंजन

कइसे जीहीं रउये बोलीं – अनिरुद्ध कुमार

गोता गोती साना सानी,

भोरेसे हीं नाचत बानीं।

ठंडी लागे कापी डोली,

कइसे जीहीं रउये बोलीं?

 

आसन बासन चौका चानी,

लीपा पोती गींजी पानी।

बेबाते सब दागे गोली,

कइसे जीहीं रउये बोलीं?

 

गोबर गोइंठा करतें बानी,

देखत बानी आनीजानी।

बचवो के सरिआईं झोली,

कइसे जीहीं रउये बोलीं?

 

के सूनेला हमार कहना,

सब चाहेला छुट्टा रहना।

सबके चाहीं घघरा चोली,

कइसे जीहीं रउये बोलीं?

 

के मनलेबा जे अब मानी,

दउड़त रहीं बन नोकरानी।

सारा चिंता भीतर घोलीं,

कइसे जीहीं रउये बोलीं?

 

सास भइल ना कौनों ठठ्ठा,

देह गलेला हट्ठा कट्ठा।

तड़पीं कुहकी मुह ना खोलीं,

कइसे जीहीं रउये बोलीं?

(सास के पति से उलाहना)

-अनिरुद्ध कुमार सिंह

धनबाद, झारखंड

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