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किलकल किलकरिया (सोहर गीत) – श्याम कुंवर भारती

 

छाईल अन्हरिया जेल के भीतरीया किलकल किलकरिया।

ये ललना सगरो फइलल अंजोरिया

किलकल किलकरिया न हो।

 

मामा कंस रहले अत्याचारी दिहले बहिना जेलवा में डारी।

ये ललना माई देवकी के बंधले हथकड़िया, लउके सगरो अन्हरिया

किलकल किलकरिया न हो।

 

बाबा बासुदेव करेले विचार सही केतना कंस अत्याचार।

ये ललना जनम लिहले कन्हईया सगरो बाजेला बधईया, खुलल जेल के केवड़िया

किलकल किलकरियां न हो ।

 

बरसे बादर घनघोर चलले बासुदेव यमुना की ओर ।

ये ललना उमड़ी यमुना छुएली चरणीया , कान्हा छुवावेले अंगुरिया

किलकल किलकरिया न हो।

 

यशोदा सुतेली अँगनवा में नंद के भवनवा में ।

ये ललना सुताई के ललनवा लोर भरी के  नजरिया ,

किलकल किलकरिया न हो।

 

शोर भइले भोरवा में गोदिया खेले ले कन्हईया जी

ललना गोकुला बाजेला बधइया उमँग सगरी नगरिया,

किलकल न हो।

 

एक मुक्तक – श्रीकृष्ण जनम।

बरसल फुहार रहे रतिया घोर अन्हार रहे।

जेल के भीतरिया में सुतल सब पहरेदार रहे।

भादो के रात में रोहिणी नक्षत्र में जेल के भीतर में।

श्री किशन जी जनम लिहले भईल उजियार रहे।

– श्याम कुंवर भारती ( राजभर), बोकारो, झारखंड

मॉब. 9955509286

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